आत्मसाक्षात्कार का पवित्र मार्ग
The Sacred Path of Self-

महावतार बाबाजी हिमालय की रहस्यमयी विभूति हैं; उन्हें क्रियायोग की अनुपम और अविरल गंगा का गोमुख माना जाता है।
भगवद्गीता में प्राणायाम का उल्लेख —श्रीकृष्ण द्वारा चौथे अध्याय के श्लोक 29–30 में—हमारे भीतर के सूक्ष्म जीवन-बल को जाग्रत करने का मार्ग बताता है। महावतार बाबाजी ने उसी प्राचीन योग प्रक्रिया को स्वाध्याय और तप के माध्यम से पुनर्जीवित किया। उन्होंने श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय को क्रियायोग की दीक्षा दी ताकि यह पथ मुमुक्षु—वह जो मुक्त होने की तीव्र कामना रखता है—उनके लिए सुलभ हो सके।
परंतु बाबाजी का संदेश केवल तकनीक तक सीमित नहीं था; उसमें एक सूक्ष्म और गूढ़ उपदेश छिपा है। बाबाजी की न तो कोई वास्तविक छवि है और न ही कोई स्थायी नाम। समय के साथ शिष्य परंपरा की तीसरी पीढ़ी में लोगों ने उनकी एक काल्पनिक छवि रची; प्रेमपूर्वक और श्रद्धा से लोग उन्हें 'बाबाजी' या 'महावतार बाबाजी' कहने लगे।
बाबाजी का मूल संदेश सरल किन्तु गहन है: पिपासु—जो आत्म-साक्षात्कार की प्यास रखते हैं—किसी नाम या रूप के पाश में न फँसें। बाह्य प्रतीकों पर निर्भरता आत्म-यात्रा को बाधित करती है। सच्ची दृष्टि वह है जो क्रियायोग में स्थित स्वाध्याय और तप की मूल प्रक्रिया को समझे और उस मार्ग पर अग्रसर हो। क्योंकि यह यात्रा रूप से 'अरूप' की यात्रा है, नाम से 'अनाम' की यात्रा है, और व्यक्तित्व से 'अस्तित्व' की यात्रा है।
Eternal Quest for the Truth
आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति में सत्य — अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप — को जानने की जिज्ञासा हो। यदि भीतर यह पिपासा ही न हो, तो स्थिति वैसी ही होती है जैसे चावल पकाने की सारी सामग्री — चावल, ईंधन, बर्तन और पानी — उपलब्ध हों, परंतु भूख न लगे; तब भला कौन भोजन बनाने का प्रयास करेगा?
और यदि किसी के भीतर सत्य को जानने की आकांक्षा जाग भी जाए, तो प्रायः वह धार्मिक स्थलों, ग्रंथों, पूजा-पाठ अथवा व्रतों की ओर अग्रसर होता है। किंतु क्या केवल इन माध्यमों से सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान संभव है? संभव है कि मन विश्वास से भर जाए, परंतु वास्तविक अनुभूति या जानने से वंचित रह जाय।
इसीलिए सबसे आवश्यक है — इस मूल प्रश्न को जानना : “मैं क्या है?”
सत्य को उपलब्ध होने के तीन प्रमुख सोपान बताए गए हैं — श्रवण, मनन और निदिध्यासन। इनके समुचित अभ्यास से मूल स्वरूप की झलक प्राप्त होती है। श्रवण प्रथम सोपान है, क्योंकि यही जिज्ञासा को जागृत करता है और आत्मोद्धार की दिशा में पहला कदम बनता है।
श्रवण को ग्रहण करते समय दो महत्वपूर्ण कसौटियों का स्मरण आवश्यक है —


Three Stages of Realization
श्रवण
श्रवण — यह जिज्ञासा जागृत करता है और स्वउद्धार की ओर प्रथम कदम बढ़वाता है।
मनन
मनन — जो सुना गया है उस पर गहन चिंतन, उसे भीतर आत्मसात करना।
निदिध्यासन
निष्ठापूर्वक स्वाध्याय और तप के प्रति नित्य उपलब्ध रहना।
अतः यह आमंत्रण है — क्रियायोगी मिथिलेश सांकृत की स्वाध्याय वाणी का श्रवण करें। अंतर्जगत की यात्रा में अग्रसर हों। संभव है कि कृपास्वरूप सत्य का साक्षात्कार हो जाए।
What is Kriya Yoga?
"तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥ २.१॥"
— Maharshi Patanjali, Yoga Sutras, Sadhana Pada 2.1
तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान — ये तीनों मिलकर क्रियायोग का निर्माण करते हैं।
महर्षि पतंजलि के अनुसार क्रियायोग केवल एक साधना नहीं, बल्कि जागृति का दिव्य विज्ञान है। इसका स्पष्ट उल्लेख योगसूत्र के द्वितीय अध्याय साधना पाद के प्रथम सूत्र में मिलता है।
क्रियायोग वह पवित्र मार्ग है जो साधक को बाहरी संसार की उलझनों से उठाकर उसके अंतरतम सत्य से जोड़ देता है। यह जीवन को रूपांतरित करने वाली प्रक्रिया है।
मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शांत, निर्मल और आनंदमय है। परंतु मन के विकार, अहंकार और “मैं” की भ्रांति उसे उसके स्वभाव से दूर ले जाते हैं। वह अपने ही बनाए विचारों, इच्छाओं और भावनात्मक बंधनों में उलझकर अशांति, भय और असंतोष का अनुभव करता रहता है। भौतिक उपलब्धियाँ बढ़ती जाती हैं, किंतु भीतर का खालीपन बना रहता है। क्रियायोग इसी अंधकार में ज्योति प्रज्वलित करने का मार्ग है।
जिस प्रकार अग्नि के बिना भोजन पक नहीं सकता, उसी प्रकार आंतरिक अग्नि के बिना अंतर्जगत आंदोलित नहीं हो सकता। क्रियायोग वही दिव्य अग्नि है जो साधक के जीवन को एकात्म लय से धन्य बना देती है।
जब “मैं” मिटता है, तभी सत्य प्रकट होता है। और उसी सत्य की ओर ले जाने वाला पथ है — क्रियायोग।
The Origin and Tradition of Kriya Yoga
क्रियायोग एक प्राचीन, सनातन और दिव्य आध्यात्मिक विज्ञान है, यह केवल योग की कोई पद्धति नहीं, बल्कि एक ऐसा सूक्ष्म विज्ञान है, जो मनुष्य को अहंकार से उठाकर ओंकार से जोड़ देता है।
यद्यपि भगवद्गीता में “क्रियायोग” शब्द प्रत्यक्ष रूप से उल्लेखित नहीं है, तथापि उसका सार अध्याय 4 के श्लोक 29 तथा अध्याय 5 के श्लोक 27–28 में अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रकट होता है, जहाँ प्राणायाम की गूढ़ प्रक्रिया का वर्णन किया गया है।
क्रियायोग शब्द का उल्लेख्य महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के द्वितीय अध्याय साधना पाद के प्रथम सूत्र में किया गया है—
“तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥ २.१॥”
अर्थात् — तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान — यही क्रियायोग है।
क्रियायोग का परम उद्देश्य है — ईश्वर-प्रणिधान, अर्थात् पूर्णत्व का प्रत्यक्ष बोध। इस अवस्था तक पहुँचने के लिए दो आधार बताए गए हैं — तप और स्वाध्याय। इन दोनों पैर पर चलते हुए साधक धीरे-धीरे अपनी सहजावस्था में अवस्थित होने लगता है।
19वीं शताब्दी में हिमालय के रहस्यमय योगी महावतार बाबाजी ने मानवता के कल्याण हेतु इस प्राचीन विज्ञान को पुनः प्रकट किया। उन्होंने श्यामचरण लहिड़ी महाशय को क्रियायोग की दीक्षा प्रदान की, जिससे यह ज्ञान केवल संन्यासियों तक सीमित न रहकर गृहस्थ जीवन जीने वाले साधकों के लिए भी सुलभ हो सका।
इस प्रकार, क्रियायोग एक ऐसा विज्ञान है— जो साधक को ससीम से असीम की , जड़ से चेतन की , और व्यक्त से अव्यक्त की यात्रा करवाती है।


The Sacred Lineage
Mithilesh Sankrit — Dedicated Seeker on the Path of Self-Awakening

सत्य को समर्पित सांकृत गोत्रीय साधक श्री मिथिलेश कुमार चौधरी, जिन्हें श्रद्धापूर्वक मिथिलेश सांकृत कहा जाता है, क्रियायोग की दिव्य परंपरा के एक शांत, सरल और सहज साधक हैं। उन्हें योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी के प्रपौत्र, गृहस्थ योगी शिबेंदु लाहिड़ी द्वारा सन 1996 में वाराणसी स्थित उनके पारिवारिक मंदिर “सत्यलोक” में क्रियायोग की दीक्षा प्राप्त हुई। गुरुदेव ने उन्हें दिव्य क्रियायोग के अंतिम चरणों तक का मार्गदर्शन प्रदान किया।
मिथिलेश जी का आध्यात्मिक संस्कार बचपन से ही दिव्यता की छाया में विकसित हुआ। उनके माता-पिता को क्रियायोग की दीक्षा योगीराज लाहिड़ी महाशय के शिष्य भूपेंद्रनाथ सान्याल महाशय से बिहार के बौंसी (भागलपुर) में प्राप्त हुई थी। इस प्रकार उनकी जीवनधारा गुरु-कृपा और साधना की परंपरा से अनुप्राणित रही।
गृहस्थ जीवन का निर्वाह करते हुए उन्होंने साधना और संसार के मध्य अद्भुत संतुलन स्थापित किया। उनकी संतानों में एक पुत्र एवं एक पुत्री विशेषज्ञ चिकित्सक हैं तथा एक पुत्र विद्वान अभियंता हैं। यह दर्शाता है कि योग केवल विरक्ति नहीं, बल्कि जागरूकता के साथ जीवन को पूर्णता से जीने की कला है।
मिथिलेश सांकृत वर्तमान में जमशेदपुर में निवास करते हुए क्रियायोग के प्रसार हेतु स्वतंत्रता में दीक्षा दान के माध्यम से इसकी शिक्षाओं और साधना-पद्धति को पिपासुओं के मध्य साझा करते हैं। सेवा भाव और करुणा से आविर्भूत मिथिलेश; भक्तों और जिज्ञासुओं के निमंत्रण पर विभिन्न नगरों में जाकर क्रियायोग कार्यक्रमों में उपलब्ध होते हैं।
क्रियायोग सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है।
आयु कम से कम इतनी हो कि व्यक्ति इस गहरी वाणी को समझ सके।
सत्य को जानने की प्यास हो।
मिथिलेश भक्तों और शिष्यों के बुलावे पर विभिन्न शहरों में जाकर दीक्षा दान करते हैं। हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर जमशेदपुर में एक आयोजन होता है। किसी भी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए इच्छुक लोगों को www.kriyayogaganga.com पर पंजीकरण करना आवश्यक है।
मानव जीवन केवल पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का क्षेत्र नहीं है; यह आत्मसाक्षात्कार की एक पवित्र साधना-भूमि भी है। मनुष्य का जन्म केवल भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए हुआ है।
क्रियायोग इसी सनातन सत्य को स्वीकार करता है कि आत्मसाक्षात्कार संसार से पलायन करके नहीं, बल्कि संसार के मध्य रहते हुए, अपने कर्तव्यों का सम्यक् निर्वाह करते हुए भी संभव है। यह मार्ग त्याग का नहीं, अपितु संतुलन, सजगता और आंतरिक जागरण का मार्ग है जिसमें उसका साधारण जीवन ही एक जीवंत तपोभूमि बन जाता है।
अतः यह दिव्य एवं अमूल्य विधा सभी के लिए सुलभ है।
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विभिन्न शहरों में समय समय पर क्रियायोग दीक्षा का कार्यक्रम होता आ रहा है, जिसके अंतर्गत गृहस्थ योगी श्री मिथिलेश सांकृत द्वारा तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
6203702516
8:00 PM – 10:00 PM (प्रतिदिन)
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जमशेदपुर, झारखंड, भारत